सीओपीडी - 21 सदी का आतंक


डॉ. वीरेन्द्र सिंह
प्रोफेसर, हेड,
एलर्जी श्रेणी और
पल्मोनरी मेडिसिन
एसएमएस अस्पताल, जयपुर
माननीय. अनुसंधान सलाहकार:
अस्थमा भवन,विद्याधर नगर, जयपुर


(सी.ओ.पी.डी. के अधिकांश मरीजों में रोग का कारण धूम्रपान, लकड़ी, कण्डे, घास-फूस आदि ईंधन के जलने का धुआं व वायु प्रदूषण आदि ऐसे कारक हंै जिनसे बचाव करके रोग से बचा जा सकता है। यह सच है कि सी.ओ.पी.डी. के रोगी को पूणतया रोग मुक्त नहीं कर सकते परन्तु आधुनिक इलाज से रोगी लगभग सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है। लेखक ने अपने लम्बे अनुभव का उपयोग करते हुए आमजन व मरीजों के मन में रोग के कारणों, निदान, उपचार एवं बचाव के बारे में उत्पन्न शंकाओं का समाधान सुझाने का प्रशंसनीय प्रयास किया है जो इस रोग के प्रति जनचेतना जगाने में सहायक होगा।

संपादक)                 

यदि गौर करें तो सांस लेना इतनी आसान शारीरिक क्रिया है कि हमारा इस ओर कभी ध्यान ही नहीं जाता है। लेकिन करोड़ों सांस के रोगियों के लिए तकलीफ के समय एक एक सांस लेना भी बहुत कठिन और दुष्कर कार्य होता है। सांस या दमा की तकलीफ दो प्रकार के फेफड़ों के रोग के कारण होती हैः अस्थमा एंव सीओपीडी। बचपन से शुरू होने वाला अस्थमा एक ऐसा रोग है जिसमें एलर्जी के कारण रोगी की श्वास नलियां सिकुड़ जाती है और इससे तकलीफ हो जाती है। अस्थमा से मिलती जुलती दूसरी बीमारी है सीओपीडी। प्रौढ़ावस्था में होने वाला सीओपीडी रोग अस्थमा से कहीं ज्यादा पीड़ादायक एवं घातक है। क्या अस्थमा और सीओपीडी एक ही बीमारी है?

इन दोनों ही बीमारियों को हम हिन्दी भाषा में दमा के नाम से जानते हैं इसलिए यह भ्रांति है। दोनों बीमारिया फेफड़ों की हैं सिर्फ यही बात एक सी है, अन्यथा यह दोनों ही बीमारिया अलग-अलग हैं। दोनों बीमारिया होने की उम्र, कारण, रोग की गंभीरता, जीवन को खतरा सभी में काफी भिन्नता है। करीब 3 करोड़ लोगों को हमारे देश में अस्थमा है। जबकि सीओपीडी से ग्रसित लोगों की संख्या इससे भी अधिक है।
अस्थमा एंव सीओपीडी की भिन्नता टेबल में बताई गई है।

  दमा सीओपीडी
उम्र शुरू बचपन बड़ी उम्र (> 40 साल)
उत्तेजक एलर्जी कारक धूल, पराग कण, पालतू पशुओं, कवक कोई एलर्जी उत्तेजक कारक
अन्य कारण धुआँ, सर्दी, गले संक्रमण, परेशान गंध शीत, वायरल संक्रमण और प्रदूषण
मुश्किल साँस लेने का समय नींद के दौरान रात में या में सुबह परिश्रम के बाद
अन्य संबद्ध लक्षण या बीमारी आंखों में खुजली, छींकने चल नाक और पित्ती दिल की बीमारी, पतली हड्डियों
कारण माता पिता, भाई बहनों में एलर्जी रोग धूम्रपान तम्बाकू का सेवन। धूल-धूऐं वाले वातावरण में रहना।

क्या सीओपीडी नया रोग है?

सीओपीडी रोग नया नहीं है इस बीमारी को लोग विभिन्न नामों से जानते हैं। ब्रांकाइटिस, एम्फीजीमा, दमा आदि कुछ ऐसे नाम हैं जो सीओपीडी रोग को इंगित करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भांति भांति के नामों से होने वाली भ्रांतियों को समाप्त करने हेतु अब इस बीमारी को सीओपीडी के नाम से जानने का निश्चय किया है एंव 17 नवम्बर 2004 को विश्व सीओपीडी दिवस मनाने का फैसला किया है।
सीओपीडी का पूरा नाम है क्रोनिक आब्सट्रक्टिव पलमोनरी डीजीज।
¬ क्रोनिक - लम्बे समय तक चलने वाली
¬ आब्सट्रक्टिव - रूकावट वाली
¬ पलमोनरी - फेफड़ों की
¬ डीजीज - बीमारी

क्या सीओपीडी एक खतरनाक बीमारी है?


जहा तक रोग से मुत्यु का सवाल है आंकडे बताते हैं कि हमारे देश के ग्रामीण अंचलों में सीओपीडी मौत का सबसे बडा कारण है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय के मृत्यु के आंकडों के विभाग के अनुसार सीओपीडी से ग्रामीण भारत में करीब 12 प्रतिशत लोगों की मृत्यु होती है जबकि दूसरे सबसे बड़े कारण हार्ट अटैक से 8 प्रतिशत लोग मरते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन 2000 के अनुसार भारत में सीओपीडी से मरने वालों की संख्या कैन्सर, मधुमेह, हार्ट अटैक और लकवे से मरने वालों की कुल संख्या से भी अधिक है। विश्व में सीओपीडी मौत का छठा सबसे बड़ा कारण है लेकिन 2020 तक आशंका है कि मौत के कारणों में इसका स्थान तीसरा होगा। सीओपीडी न केवल मौत का ही कारण है बल्कि मानव पीड़ा का भी यह एक बहुत बड़ा कारण है। तेज़ सीओपीडी रोग से ग्रसित व्यक्ति कुछ कदम चलने के लिए भी तरस जाता है। थोड़ा चलते ही सांस बेकाबू हो जाता है। दैनिक जीवन के साधारण काम जैसे स्नान करना, शौच जाना जैसे काम करते समय भी रोगी सांस में तकलीफ के कारण छटपटा उठता है। ऐसे रोगियों का जीवन चारपाई पर ही बीतता है। तेज बीमारी में बैठने, करवट बदलने यहा तक की खांसते समय भी असाध्य पीड़ा होती है। ऐसी स्थिति में कार्य के समय सांस में होने वाली पीड़ा का अन्देशा दिलोदिमाग पर ऐसा छाता है कि व्यक्ति और कुछ सोच ही नहीं पाता है।

क्या सीओपीडी एक छुआछूत की बीमारी है?


किसी भी प्रकार के सम्पर्क से सीओपीडी रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को नहीं लग सकता। साथ-साथ खाना खाने, खेलने, एक ही बिस्तर पर सोने, आपस में बातचीत करने से भी सीओपीडी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को नहीं हो सकता।

सीओपीडी किन लोगों को होता है?


जीवन चलाने के लिए सबसे आवश्यक तत्व है श्ुाद्ध हवा। ईश्वर दयालु है जिसने हमें प्रचुर मात्रा में शुद्ध हवा दी है और वह भी बिल्कुल मुफ्त। लेकिन विडम्बना यह है कि बहुत से लोग इस बात के महत्व को नहीं जानते और इस प्राणवायु में धूम्रपान अथवा प्रदूषण के धूएं की मिलावट कर बैठते हैं। धूएं से मिलावटी सांस जब सांस नलियों एंव फेफड़ों में जाता है तो उन लोगों में विकार पैदा कर देता है। निरन्तर लम्बे समय तक इस धूएंदार सांस को लेने पर फेफड़ों में गम्भीर बीमारी सीओपीडी उत्पन्न हो जाती है। सीओपीडी साधारणतया 40 साल की उम्र के बाद होता है। बच्चों में यह बीमारी नहीं होती है।

सीओपीडी के कारण क्या हैं?


धूम्रपान के धूएं की मिलावट फेफड़ों के लिए बहुत घातक होती है। सीओपीडी के 80 प्रतिशत रोगी वे होते हैं जो धूम्रपान करते हैं। 20 प्रतिशत सीओपीडी के रोगी हालांकि धूम्रपान नहीं करते फिर भी रोग से ग्रसित होते हैं क्योंकि वे धूएं वाले वातावरण में रहते हैं। इनमें लकड़ी अथवा उपले से खाना बनाने वाली महिलायें, धुआं उगलने वाले कारखानों में काम करने वाले लोग एंव वाहनों के धुएं से प्रदूर्षित बाजारों एंव सड़कों के आस-पास रहने व काम करते लोग।


तंबाकू प्रेरित रोग लाख में प्रतिशत
सीओपीडी 1.25 23%
कैंसर 1.00 18%
हृदय रोग (सीएडी) 0.85 15%
पक्षाघात (CVA) 0.45 8%
फेफड़ों में संक्रमण 0.20 4%
टीबी 0.15 3%
संबंधित अन्य तंबाकू रोगों 1.60 29%
  5.5 (दस लाख) 100%

स्रोत: विश्व तम्बाकू महामारी, 2008 MPOWER पर डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट. [ऑनलाइन उपलब्ध से www.who.int / tobacco / mPower. [May2010 में पहुँचा].

सीओपीडी रोग के क्या लक्षण हैं?


Φ लम्बे समय तक कफ, बलगम, खंखार बनना
Φ खा सी
Φ सर्दियों में खांसी होना
Φ मेहनत के समय सांस फूलना।
धूम्रपान करते व्यक्ति में यदि उपरोक्त लक्षण बार-बार हों, तो सोचना चाहिये कि सीओपीडी रोग की शुरूआत हो चुकी है।

सीओपीडी रोग का पक्का पता क्या एक्सरे से लगता है?


अक्सर सीओपीडी के रोगी को जब शुरूआती लक्षण होते हैं तो एक्सरे करवाया जाता है लेकिन सीओपीडी रोग में एक्सरे अक्सर सामान्य ही होता है। इस रोग की शुरूआत का अथवा गम्भीरता का पता लगाने के लिए स्पाईरोमीटर नामक टेस्ट करवाने की जरूरत होती है। आम आदमी ही नहीं बल्कि बहुत से चिकित्सक भी इस टेस्ट से अनभिज्ञ होते हैं। टेस्ट नहीं होने के कारण रोग का पता प्रारम्भिक अवस्था में नहीं लग पाता है। टैस्ट के बिना रोग का पता तक लगता है जब बीमारी गंभीर अवस्था में पहु च जाती है।

क्या सीओपीडी रोग लाइलाज है?


‘‘दमा-दम के साथ जाता है‘‘ एक बार दमा होने के बाद जीवन भर तड़प तड़प कर ही जीना पड़ता है‘ जैसी विचार धारायें न केवल रोगी मानते हैं बल्कि अधिकांश चिकित्सक भी इससे सहमत होते हैं। एक बार सीओपीडी होने पर यह सही है कि अधिकांश रोगियों में यह रोग जड़ से खत्म नहीं होता। लेकिन यह भी सही है कि सही प्रकार से इलाज लेने पर लगभग सभी रोगी तकलीफ मुक्त, सुखद जीवन जी सकते हैं। नई प्रकार की दवाइया एंव इलाज, कम से कम सांस में होने वाली भयंकर वेदना से तो राहत दिला ही सकता है। यदि अन्य रोगों से तुलना की जाये तो ईलाज से सीओपीडी में कम से कम इतना फायदा अवश्य होता है जितना फायदा दवाईयों से अन्य रोगों जैसे ब्लड प्रेशर, ह्रदय रोग, गठिया, डायबिटीज में होता है।

समय के साथ-साथ सीओपीडी रोग की गम्भीरता क्यों और कैसे बढती है?


जो रोगी धूम्रपान छोड़ देते हैं उनमें रोग की गम्भीरता में कमी अवश्य आती हैं लेकिन रोग बना रहता है। शुरूआत में खांसी और बलगम ही सीओपीडी के लक्षण होते हैं। सीओपीडी होने के बाद भी जो रोगी धूम्रपान नहीं छोडते अथवा धूएंदार सांस लेते रहते हैं ऐसे लोगों में सीओपीडी की गम्भीरता धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। सांस फूलनें की शुरूआत का अर्थ है सीओपीडी रोग का प्रारंभिक अवस्था से गंभीर अवस्था में प्रवेश। यदि व्यक्ति धूम्रपान करता रहता है तो श्वास नलियों एंव फेफड़ों के ऊतक एक प्रकार जल कर नष्ट हो जाते हैं। इससे फेफड़ों की क्षमता कम होने लगती है। फेफड़ों में रिजर्व क्षमता बहुत होती है इसलिये फेफड़ों की क्षमता में 30-40 प्रतिशत की कमी तक भी रोगी को सिर्फ खांसी-बलगम की ही तकलीफ होती है। रोग के आगे बढ़ने पर सांस में तकलीफ हर समय रहने लगती है। हम सांस लेते हैं फेफड़ों के द्वारा आॅक्सीजन शरीर के अन्दर लेने और कार्बन डाई आॅक्साइड को बाहर निकालने के लिए। जब फेफड़ों के ऊतक नष्ट हो जाते हैं तो फेफड़े शरीर की जरूरत के अनुपात में आक्सीजन नहीं पहु चा पाते हैं तथा शरीर में आॅक्सीजन की कमी एंव कार्बन डाई आॅक्साइड बढ जाती है। सीओपीडी की इस गंभीर अवस्था को ‘रेस्पीरेटरी फेल्योर‘ कहते हैं। जिस प्रकार ह्रदय फेल होने को हार्ट फेल्योर कहते हैं उसी प्रकार फेफड़ों के फेल होने को ‘रेस्पीरेटरी फेल्योर‘ कहते हैं। ऐसी अवस्था में रोगी कुछ कदम चलने पर ही बेहाल हो जाता है। स्नान करना, शौच जाना जैसे दैनिक कार्याें के लिए भी उसे मदद लेनी पड़ती है। आॅक्सीजन की ओर कमी होने पर रोगी को हर सांस के लिए संघर्ष करना पड़ता है। साधारण व्यक्ति को दौड़ते समय जितनी ताकत या एनर्जी लगानी पडती है, तेज सीओपीडी के रोगी को उतनी ताकत या एनर्जी आराम से बैठी अवस्था में भी सांस लेने में खर्च करनी पड़ती है। इसलिये ऐसी अवस्था में रोगी का वजन घटता जाता है और वह हडडीयों का ढा चा मात्र रह जाता है।

कितने वर्षों तक धूम्रपान करने पर ‘सीओपीडी बीमारी‘ होती है?


अलग-अलग लोगों में धूम्रपान की अलग-अलग मात्रा लेने के बाद सीओपीडी रोग शुरू होता है। अक्सर देखा गया है कि 15-20 वर्षों तक धूम्रपान करने के बाद सीओपीडी रोग की शुरूआत होती है। फेफड़े शरीर के बहुत मजबूत अंग होते हैं, 15-20 वर्ष तक तो वे धूएंदार हवा बिना विकार के सहन कर लेते हैं । इसके बाद धुएंदार हवा सांस में जाने पर श्वासनलियों में सूजन और बलगम बनने लगता है। इसलिये शुरू के कई वर्षों तक बलगम ज्यादा आने की तकलीफ ही एक मात्र सीओपीडी का लक्षण होता है। इसके बाद के वर्षों में चलती आ रही है। जब भी कोई आदमी हवेली या घर के अन्दर जाता है तो जोर से खांसने की आवाज करता है (खंखारा करना) जिससे घर की महिलायें पर्दा कर लें। खंखारा करने के साथ ही फेफड़ों में जमा बलगम निगला जाता है और पेट में चला जाता है। इस दौरान इस व्यक्ति को पता भी नहीं चल पाता की उसे बलगम या कफ बनने की तकलीफ है। ग्रामीण महिलायें भी बलगम की तकलीफ नहीं बताती हैं आम जीवन में खांसना-कफ बाहर फेंकना महिलाओं में अच्छा नहीं माना जाता, इसलिये खांसने के साथ आने वाले बलगम को महिलायें बिना आभास के ही निगल जाती हैं। इस प्रकार रोग की प्रारंभिक अवस्था बिना आभास के निकल जाती है। रोगी धूम्रपान करता रहता है एंव रोग गंभीरता की ओर बढ़ता जाता है।

प्रारंभिक अवस्था में सीओपीडी का उपचार क्या है?


सीओपीडी की किसी भी अवस्था में रोग की गम्भीरता में कमी लाने का सबसे महत्वपूर्ण कदम है - धूम्रपान छोडना एंव धूएंदार हवा से सांस को बचाना। धूम्रपान छोडने के बाद फेफड़ों की अवस्था में सुधार आता है। नियमित व्यायाम और पौष्टिक आहार जैसे फल, प्रोटीन और हरी सब्जिया रोग में आराम दिलाने में मदद करते हैं।

ईलाज से सीओपीडी की तकलीफ में क्या लाभ मिल सकता है?


इलाज लेने से तकलीफ में निम्न प्रकार से लाभ मिल सकता है।
Φ सांस लेने से होने वाली तकलीफ में कमी
Φ खांसी में कमी
Φ कफ-बलगम में कमी
Φ शारीरिक क्षमता में वृद्धि
Φ दैनिक कार्य करने में होने वाली कठिनाई में कमी
गंभीर अवस्था में सीओपीडी का उपचार क्या है?


Φ बीमारी नहीं बढे़ः
रोगी को चाहिये की धूम्रपान को पूरी तरह से बन्द कर दे। ऐसी अवस्था में एक बीड़ी या एक चिलम प्रतिदिन भी घातक है।
Φ तकलीफ में आरामः
चिकित्सक की सलाह से दवा अवश्य लें। आजकल इन्हेलर के माध्यम से ली जाने वाली कई असरदार दवाइया बाजार में उपलब्ध हैं। इनको लेने से सांस की तकलीफ में आराम मिलता है।
Φ शारीरिक परिश्रम की क्षमता में वृद्धिः
विशेष प्रकार के व्यायाम मिला कर रेस्पीरेटरी रिहेबीलिटेशन प्रोग्राम बनाया गया है। इंडियन जर्नल आफ चेस्ट डीजिज में प्रकाशित हमारे शोध के अनुसार इस प्रकार के व्यायाम करने से सीओपीडी की गम्भीर रोगियों की शारीरिक क्षमता में भी काफी वृद्धि पाई गई।
Φ तेज दौरे से बचाव के तरीके (सर्दियों में विशेष तौर से निम्न का ध्यान रखें)
• इनफेक्शन के लिए वैक्सीन का उपयोग
• जुकाम-खांसी वाले लोगों से दूर रहें
• ठण्ड से बचें
• गर्म कपडे पहने।
• स्कूटर पर जाते समय अथवा ठण्ड में जाते समय गले में उन से बना हाई नेक पहने
• पैरों में गर्म मौजे पहने
• खुले में स्नान नहीं करें
• सर्दियों में गर्म पानी से स्नान करें।
• महिलायें बाल धोकर ड्रायर से सुखायें।
• ठंडी- खटटी अथवा चिकनी चीजों पर ठण्डा पानी नहीं लें। जैसे ठण्डा खट्टा दही या छाछ। मिठाई लेने के बाद भी ठण्डा पानी ना पीयें।
• दोपहर बाद धूप हटने पर देर तक कमरे से बाहर नहीं बैठें।
• बरसात में नहीं भीगें।
• जुकाम- खांसी होते ही एन्टीबायोटिक्स का इलाज लें।

Φ निम्न दवा कभी भी नहीं लेंः

प्रोपेनोलोलः (इंडेरोल, सिपलार) ब्लड प्रेशर कम करने वाली दवा नींद की गोलीः गम्भीर सीओपीडी के रोगियों में आॅक्सीजन की कमी और कार्बन डाई आक्साइड के बढने से बैचैनी, घबराहट एंव नींद नहीं ओने जैसी तकलीफ होने लगती है। ऐसे में कभी भी नींद की गोली नहीं लें। नींद की गोली ऐसी अवस्था में प्राणघातक सिद्ध हो सकती है। रेस्पीरेटरी फेल्योर- बहुत गम्भीर सीओपीडी के रोगियों के रक्त में आॅक्सीजन की कमी हो जाती है जिससे वे रेस्पीरेटरी फेल्योर की अवस्था में आ जाते हैं। इनमें से कुछ रोगियों में कार्बन डाईआक्साइड सामान्य ही रहती है, ऐसे रोगी घर पर आॅक्सीजन लेकर सांस तकलीफ से आराम पा सकते है। आॅक्सीजन सिलेन्डर अथवा आक्सीजन कन्सन्ट्रेटर ली जा सकती है। बडे शहरों में आॅक्सीजन कम्पनियों दो से तीन हजार रूपये सिक्योरिटी लेकर बड़ा सिलेन्डर दे देती है। यह कम्पनियां घर पर सिलेन्डर भरने की सुविधा भी 200-300 रूपये में कर देती हैं। दूसरा तरीका है ‘आॅक्सीजन कनसन्टेªटर‘ से। यह एक मशीन होती है जो वातावरण से आक्सीजन निकाल कर रोगी को दे देती है। हालांकि यह 50-70 हजार रूपये में आती है। लेकिन लम्बे समय तक आॅक्सीजन लेने पर सस्ती पड़ती है। रेस्पीरेटरी फेल्योर से ग्रसित सीओपीडी के उन रोगियों में जिनमें आॅक्सीजन की कमी के साथ साथ कार्बन डाई आक्साइड भी बढ जाती है इनमें सिर्फ आक्सीजन लेने से तकलीफ कम होने की बजाय बढ़ जाती है। ऐसे रोगियों के लिए ‘बाईपैप‘ मशीन एक प्रकार से वरदान है। घर पर लगायें जाने वाली यह वैन्टीलेटर मशीन है। यह मशीन न केवल शरीर में आक्सीजन बढ़ाती है बल्कि कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा भी कम कर देती है।

खतरे के चिन्हः

नियमित इलाज के बावजूद जब सीओपीडी के रोगियों में निम्न लक्षण आयें तो उन्हे तुरन्त चिकित्सक की सहायता लेकर नियमित के अतिरिक्त एमरजेन्सी इलाज लेना चाहिये।
Φ जुकाम-खांसी होना
Φ बलगम बढना
Φ बलगम का रंग पीला- हरा होना
Φ घबराहट, बैचेनी नींद नहीं आना
Φ बुखार होना
Φ सांस की गति तेज होना
Φ चलने पर ज्यादा सांस फूलना।
Φ ज्यादा नींद या गैर आना।

डॉ. वीरेन्द्र सिंह