स्वाइन फ्लू के बारे में जानें



डॉ. सूर्या कांत
प्रोफेसर
पल्मोनरी मेडिसिन विभाग
सीएसएम चिकित्सा विश्वविद्यालय लखनऊ (उत्तर प्रदेश)


स्वाइन फ्लू की गंभीरता को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 11 जून 2009 को विश्व व्यापी महाामरी की चेतावनी घोषित की। सामूहिक विश्व व्यापी प्रयासों से से महामारी पर जल्द ही काबू पा लिया गया और अगस्त 2010 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी को हटाने के संकेत दे दिये। परन्तु अभी भी भारत के विभिन्न क्षेत्रों से स्वाइन फ्लू के रोगी होने के समाचार है। इस संदर्भ में डाॅ. सूर्यकान्त का लेख आमजन में इस रोग के कारण, निदान, ईलाज एवं बचाव के प्रति आमजन का ज्ञान वर्धन कर चेतना जगाने में अवश्य ही सहायक होगा।

संपादक                 


आम बोलचाल में स्वाइन फ्लू के नाम से जाना जाने वाला इन्फ्लुएंजा एक विशेष प्रकार के वायरस (विषाणु) इन्फ्लुएंजा ए एच1 एन1 के कारण फैल रहा है। यह विषाणु सुअर में पाये जाने वाले कई प्रकार के विषाणुओं में से एक है। मार्च 2009 में दक्षिण अमेरिका में इस नये वायरस की खोज हुई फिलहाल जीनीय परिवर्तन होने के कारण यह विषाणु बेहद घातक और संक्रामक बन गया था। विषाणुओं के जीन पदार्थ में स्वाभाविक तौर पर परिवर्तन होते रहते हैं। फलस्वरूप इनके आवरण की संरचना में भी परिवर्तन आते रहते हैं। यह परविर्तन यदि बहुत कम है तो इसकी एण्टीजेनिक प्रकृति, एवं षरीर की प्रतिरक्षा तन्त्र द्वारा पहचान और रोकथाम के तरीके में बदलाव नहीं होता। बडे परिवर्तन की स्थिति प्रतिरक्षा तन्त्र को विषाणु का मुकाबला करने में अक्षम बना देती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि षरीर के प्रतिरक्षा तन्त्र के पास उससे निबटने के लिए एण्टीबाॅडीज का आभाव होता है। 2009 की स्वाइन फ्लू की बीमारी का कारण इन्फ्लूएंजा ‘ए’ टाइप के एक नये विशाणु एच1 एन1 के कारण है इस विशाणु के अन्दर सुअर मनुश्यों और पक्षियों को संक्रमित करने वाले फ्लू विशाणु का मिला-जुला जीन पदार्थ है तीनांे के पुर्नयोजन से बना यह नया एच1 एन1 के मानव समुदाय और उसके प्रतिरक्षा तन्त्र के लिए अभी तक पहेली बना हुआ है। जीन परिवर्तन से बनी यह किस्म ही मैक्सिको, अमेरिका और पूरे विष्व में स्वाइन फ्लू के प्रसार का कारण बनी। 16 मई 2009 को भारत में स्वाइन फ्लू के पहले रोगी के पाये जाने की चिकित्सकीय पुश्टि हुई में अब तक इस रोग से हजारों लोग संक्रमित हो चुके हैं जिससे लगभग 1300 मौतें हो चुकी हैं। 18 मई 2009 में विष्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा स्वाइन फ्लू को महामारी घोशित किया गया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि


बीसवीं सदी में फ्लू की महामारी क्रमषः तीन बार 1918, 1957 और 1969 में अपने भयावह रूप में सामने आयी थी 1918 की फ्लू महामारी में विषाणु का स्त्रोत सुअर थे इस फ्लू को स्पेनिष फ्लू के नाम से जाना जाता है। यह महामारी इतनी मृत्युघ् ााती और मारक थी कि इसने दुनियाभर में पांच करोड़ से अधिक लोगों को मौत के घाट उतार दिया। दूसरी और तीसरी महामारी जिन्हें क्रमषः एषियन फ्लू ओर हांगकांग फ्लू के नाम से जाना जाता है के विशाणुओं के स्त्रोत पक्षी थे इन दोनेां महामारियो के अनुसार क्रमषः 70 हजार और 34 हजार लोगों की मौत हुई।

लक्षण


एच1 एन1 फ्लू विषाणु के संक्रमण में कई तरह के लक्षण देखने को मिल सकते हैं। इन लक्षणों में बुखार,खाँसी, गले में तकलीफ, शरीर दर्द, सिर दर्द, कंपकपी तथा कमजोरी प्रमुख हैं। कुछ लोगों में दस्त और उल्टियाँ भी देखने को मिल सकती हैं। सर्दी-जुकाम, इन्फ्लुएंजा (फ्लू) और स्वाइन फ्लू ये तीनों आपस में एक जैसे लगते हुए भी अलग-अलग हैं। साधारण सर्दी-जुकाम और मौसमी फ्लू के लक्षण अलग-अलग होते है। यह सभी लक्षण बीमारी प्रारम्भ होने के एक या दो दिन के अन्दर ही तेजी से पनपते हैं कुछ रोगियों में बीमारी इसी अवस्था में सीमित होकर धीरे-धीरे कम हो जाती है लेकिन कुछ मरीजों में यह बीमारी जटिल रूप धारण कर लेती है। इसमें से कुछ रोगियों को सांस की तकलीफ बढ़ने लगती है। खांसी में बलगम व खून भी आ सकता है

लक्षण जुकाम फ़्लू
बुखार ग्रेड निम्न उच्च
सिरदर्द नरम गंभीर
शरीर में दर्द शायद ही कभी ज्यादातर गंभीर
कमजोरी नरम 2-3 सप्ताह के अवशेष
अयस्क गले साधारण कभी कभी
साँस लेने में समस्या थोड़ी गंभीर

स्वाइन फ्लू कैसे फैलता है?

स्वाइन फ्लू का संक्रमण व्यक्ति को स्वाइन फ्लू के रोगी के सम्पर्क में आने पर होता है। स्वाइन फ्लू से प्रभावित व्यक्ति के स्पर्श (जैसे हाथ मिलाना), छींक, खाँसने या उसकी वस्तुओं के सम्पर्क में आने से होता है। खाँसने, छींकने या आमने-सामने निकट से बातचीत करते समय रोगी से स्वाइन फ्लू के विषाणु दूसरे व्यक्ति के श्वसन तंत्र (नाक, कान, मुँह, साँस मार्ग, फेंफड़े) में प्रवेश कर जाते हैं। अधिकतर लोगों में यह संक्रमण बीमारी का रूप नहीं ले पाता या कई बार सर्दी, जुकाम, गले में खराश तक ही सीमित रहता है।

उच्च जोखिम समूह


लोग लोग जिनका प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) कमजोर होता है, जैसे बच्चे, बूढ़े, डायबिटीज या एच.आई.वीके रोगी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस के मरीज, नशे के लती, कुपोषण, एनीमिया या अन्य क्रानिक बीमारियों से प्रभावित लोग तथा गर्भवती महिलाएँ इस संक्रमण की चपेट में जल्दी आती हैं। इन लोगो में संक्रमण क कारण मृत्यु दर तुलनात्मक रूप से अधिक होती है साथ ही इनको अस्पताल मे भर्ती करने की जरूरत अन्य लोगो की अपेक्षा ज्यादा हो सकती है।

जटिलता


स्वाइन फ्लू के सामान्य लक्षणों के जटिल होने के क्रम में रोगी को लोअर रेस्पाइरेटरी ट्रेक्ट इन्फेक्शन, डिहाइड्रेशन तथा न्यूमोनिया हो सकता है। ऐसी स्थितियोंमें रोगी की जान खतरे में रहती है। स्वाइन फ्लू की लक्षण साधारण सर्दी मौ समी फ्लूबु खार का स्तर नीचा ऊ ँचा सिर दर्द हल्का काफी शरीर दर्द शायद ही कभी अक्सर काफी तेज कमजो री हल्की 2-3 हफ्ते रहती है खराब गला सामान्य कभी-कभी छाती में तकलीफ हल्की सामान्य ज्यादातर जटिलताएँ मौसमी फ्लू की तरह हैं। इनमें पुरानी गम्भीर बीमारी का बिगड़ना जैसे ऊपरी रेस्पाइरेटरी ट्रेक्ट की बीमारियाँ (साइनोसाइटिस, ओटाइटिसमिडिया तथा क्रूप), लोअर रेस्पाइरेटरी ट्रेक्ट की बीमारियाँ (न्यूमोनिया, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा) तथा हृदय सम्बंधी बीमारियाँ मायोकार्डाइटिस व पेरीकार्डाइटिस प्रमुख हैं।इनके अलावा कई न्यूरोलाॅजीकल डिसआॅर्डर भी हो सकते हैं। बीमारी के दौरान मरीज को टाक्सिक शाॅक सिन्ड्रोम तथा सेकेन्डरी न्यूमोनिया हो सकता है।

मृत्यु दर


अब तक प्राप्त आकडों के अनुसार इस बीमारी की मारकता .5 से एक फीसदी तक हो सकती है इसलिए ेफिलहाल इसके पुर्नप्रसार से बहुत ज्यादा भयभीत होने की आवष्यक्ता नहीं है लेकिन इस बात की आषंका से इनकार नही किया जा सकता कि यह विशाणु अपना स्वरूप बदल ले। उस स्थिति में इसकी मारकता और संक्रामकता में पांच गुना तक बढ़ोत्तरी हो सकती है। इसलिए जरूरी है कि जोखिम समूह के व्यक्ति खास तौर पर अस्थमा और सी.ओ.पी.डी. के मरीज स्वाईन फ्लू का टीका अवष्य लगवा लें।

संदिग्ध मामला



जब पीडित मे स्वाइन फ्लू के लक्षण व बुखार (38डिग्री सेन्टीग्र्रेट से ज्यादा) हो तथा
1. वह पिछले सात दिनों मे स्वाइन फ्लू पीडि़त के सम्पर्क मे आया हो। या
2. किसी ऐसे इलाके की यात्रा से लौटा हो जहा स्वाइन फ्लू के एक या अधिक रोगी हो।
3. किसी ऐसे इलाके का निवासी हो जहा स्वाइन फ्लू के एक से अधिक मरीज पाये जाए।

                         संभावित केस


किसी मरीज को स्वाइन फ्लू होने की पुष्टि तब मानी जा सकती है, जब नेजोफरेंजियल स्वाब निम्न तीन में से किसी एक के लिए सकारात्मक हो-
1. विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला से पीडि़त की जाँच में
इन्फ्लुएंजा ए एच1 एन1 एण्टीबाॅडीज की संख्या चार गुना अधिक पायी जाए।
2. रियल टाइम पी.सी.आर. जाँच पाॅजीटिव हो।
3. वायरल कल्चर की जाँच पाॅजीटिव हो। उपचार


स्वाइन फ्लू का उपचार चिकित्सक की सलाह पर रोगी के लक्षणों के आधार पर किया जाता है, जिसमें प्रमुख रूप से बुखार के लिए पैरासिटामाॅल, खाँसी के लिए कफ सीरप, सर्दी-जुकाम व छींकों के लिए एंटी एलर्जिक दवाएँ शामिल हैं।
विषाणुरोधी दवा नए इन्फ्लुएंजा ए एच1 एन1 के नियंत्रण में विषाणुरोधी दवा ओसेल्टामिवीर फास्फेट खासी कारगर है। इसके अलावा जेनामिवीर नामक विषाणुरोधी औषधि भी स्वाइन फ्लू के उपचार में प्रयुक्त हो रही है। केवल योग्य चिकित्सक के परामर्श से ही इन दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए। इन दवाओं से बीमारी की तीव्रता बहुत कम हो जाती है और इस बीमारी से होने वाले दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है।

वैकल्पिक चिकित्सा व अन्य उपाय


बीमारी की अवस्था मे पूरी तरह से आराम करना चाहिए। डिहाइड्ेसन (षारीर मे पानी की कमी) से बचने के लिए जरूरी है कि पेय पदार्थो का भरपूर मात्रा मे सेवन किया जाए। इससे बीमारी के लक्षणो मे गुणात्मक सुधार होता है
काढ़ाः तुलसी, अदरक, लौग, काली मिर्च और गुडची के काढे के सेवन से लाभ होता है। पेय पदार्थः गुनगुने पानी तथा अन्य पेय पदार्थ जैसे हल्की चाय के सेवन से भी लक्षणो मे लाभ होता है। खान-पानः हल्का तथा सुपाच्य भोजन छोटे-छोटे हिस्सो मे कई बार लेना चाहिए।
बचाव


• टीकाकरण
फ्लू वैक्सीन, फ्लू से बचाव के लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय है। स्वाइन फ्लू का टीका अव बाजार मे आसानी से उपलब्ध है। अब नियमित फ्लू टीके में भी स्वाइन फ्लू से प्रतिरक्षा षामिल है। यह टीका गर्भवती महिलाओं तथा बच्चों के लिए भी सुरक्षित है। जोखिम मे षामिल सभी लोगो के लिए टीकाकरण अत्यधिक आवष्यक है।
• मास्क
अस्पतालो मे मास्क के प्रयोग से विषाणु के प्रसार मे कमी आती है। लेकिन इसका प्रभावी प्रयोग मास्क के सही उपयोग निरन्तर उपलब्धता व समुचित निस्पादन (क्पेचवेंस) पर निर्भर है इसलिए कुछ विषेष परिस्थितियो को छोड़कर मास्क के लिए ज्यादा मारा मारी गैर जरूरी है। • अन्य उपायः
स्वाइन फ्लू का संक्रमण स्वाइन फ्लू से पीडि़त मरीज की खांसी या छींक के साथ निकली बेहद सूक्ष्म बूंदों (ड्रापलेट न्यूक्लियाई) से फैलता है। इसकी एक बूंद में एक लाख से लेकर दस लाख विशाणु तक हो सकते हैं। यह विशाणु किसी भी सतह पर 10 से 72 घण्टे तक जिन्दा रह सकते है। इसके अलावा पीडि़त जिन वस्तुओं को छूता है उनसे भी संक्रमण फैल सकता है। निम्नलिखित उपायों को अपनाकर आप स्वाइन फ्लू से अपना बचाव कर सकते है।
• क्या करेः
1. खाँसते या छींकते समय मुँह पर हाथ रखें या रूमाल का प्रयोग करें।
2. स्वाइन फ्लू के रोगी द्वारा इस्तेमाल की गई वस्तुओं जैसे रूमाल व चादरों आदि को सुरक्षित विधि से साफ करें।
3. खाने से पहले साबुन से हाथ धोएं।
4. अगर आप मे फ्लू के लक्षण है तो तुरन्त डाक्टर की सलाह लें और घर मे ही रहे।
5. फ्लू पीडित से कम से कम एक मीटर दूर रहे। • क्या न करेंः
1. भीड़-भाड़ वाले इलाकों में न जायें।
2. हाथ मिलाने या गले मिलने से बचें।
3. बिना हाथ धोये अपने नाक, आख और मुह को न छुये।

डॉ. सूर्या कांत