दमा   


डॉ. एम. साबिर
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(विश्व के लगभग 30 करोड़ अस्थमा से पीडि़त मरीजों में से अधिकतर रोगी अस्थमा होने के कारण, निदान, इलाज एवं बचाव संबंधित ज्ञान से अनभिज्ञ है। अस्थमा के इलाज में औषधियों की उपलब्धता के साथ साथ इस रोग के प्रति रोगी, परिजनों, चिकित्सा कर्मियों आदि में इसके कारण, कारक, इलाज एवं बचाव एवं औषधि लेने के तरीकों का ज्ञान होना अति आवश्यक है। यह लेख इस ओर एक कंचित प्रयास है।

संपादक)                    


अस्थमा या दमा फेफड़ों की श्वास नलियों पर असर करने वाली बीमारी है। विश्व में लगभग 5 से 10 प्रतिशत (कहीं कहीं इससे भी अधिक) लोग इस रोग से ग्रस्त है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक विश्व में लगभग 30 करोड़ से अधिक अस्थमा रोगी हैं एवं प्रतिवर्ष इनमें से करीब 2 लाख मृत्यु को प्राप्त होते हैं। हमारे देश में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार लगभग 2.5 प्रतिशत व्यस्क इस रोग से पीडि़त हैं। अस्थमा कम उम्र में विशेषकर बच्चों में ज्यादा होता है। हालांकि अस्थमा से मृत्यु कम होती है परन्तु कार्य क्षमता का ह्नास एवं स्कूल से अनुपस्थिति अत्यधिक है। पिछले तीन दशकों में अस्थमा में नये नये अनुसंधानों, इलाज के नये उपायों से रोगी लक्षण रहित सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है परन्तु रोग को जड़ से समाप्त करने के उपायांे के लिए अभी भी प्रयास जारी है।

अस्थमा: प्रेरणा और कारक

सामान्यतः एक व्यक्ति प्रतिदिन वातावरण से दस हजार लीटर वायु श्वास नलियों द्वारा फेफड़ों के अन्दर लेकर बाहर निकालता है। इस प्रक्रिया में प्राणवायु आॅक्सीजन के अलावा वातावरण में उपस्थित अन्य कई वांछित/अवांछित तत्व भी श्वसन तंत्र में आ जाते है।
अस्थमा रोगियों में वंशानुगतता, स्वयं एवं अन्य परिजनों में धूम्र-पान की लत, बचपन में श्वसन तंत्र में बार बार संक्रमण व अन्य कई ज्ञात-अज्ञात कारणों से श्वास नलियां अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है।
कुछ लोगों की सामान्य या सवंेदनशील हुई श्वांस नलियां जब श्वांस प्रक्रिया के दौरान ग्रहण की गई वायु में मौजूद कुछ परिस्थितियों या तत्वों के संपर्क में आती है तो इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न इनफ्लेमेशन से सिकुड़ जाती हैं। इस प्रकार के इनफ्लेमेशन से श्वांस नलियों की दिवारों में सूजन आना म्यूकस (बलगम या खंखार) का इकठ्ठा होना व इन सब प्रक्रियाओं के साथ साथ श्वांस नलियों की मांस पेशियों मंे तनाव उत्पन्न होने से श्वांस नली का छिद्र छोटा हो जाता हैं एवं श्वांस लेने एवं निकालने में कठिनाई का अनुभव होता है।
यह परिस्थितिया/कारण कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे कि धूम्रपान, रसोई एवं अन्य चिमनियों का धु आं, मौसम परिवर्तन, धूल मिट्टी, वायु प्रदूषण, व्यायाम, परागकण, पालतू जानवरों के बाल, फर, चमड़ी की कोशिकाऐं एवं ओर्गेनिक पदार्थों, पटाखों का धुआ, एवं अत्यधिक ठंडी/गर्म हवा, रंग रोगन, सुगन्ध, तिलचट्टा व अन्य घरेलू कीड़े मकौड़े, काई, सीलन आदि-आदि।
शरीर के बचाव तंत्र व वातावरण में उपस्थित इन्हीं कुछ तत्वों से होने वाली जटिल प्रक्रियाएं शायद अस्थमा होने के लिए उत्तरदायी हैं
अधिकांश मरीजों में अस्थमा के लक्षण दौरों में आते हैं। विभिन्न मरीजों के विभिन्न दौरों के बीच का अन्तराल व भयंकरता भिन्न हो सकती है। अस्थमा का दौरा ज्यादातर विशेष वस्तुओं के सम्पर्क, मौसम एवं विशेष परिस्थितियों में पड़ता है। बहुदा रोगी को इसका ज्ञान रहता है। कुछ रोगियों को आंधी, बरसात या मौसम के बदलाव का अहसास अन्य लोगों से काफी पहले ही हो जाता है (अस्थमा के लक्षण प्रकट होने से)।

अस्थमा के लक्षण


• समय समय पर आती जाती खांसी खंखार व इसकी वजह से नींद में बाधा
• शारीरिक श्रम से खांसी या सांस का फूलना
• सांस के साथ सीटी जैसी आवाज आना एवं
• छाती में जकड़न आदि।

अस्थमा का निदान

ऐसे रोगी जिनमें अस्थमा के लक्षण विद्यमान हों इनमें निदान के लिए पहले फेफड़ों से संबंन्धित अन्य संक्रामक रोग जैसे टी.बी., न्यूमोनियां आदि होने की संभावना का संशय एक्स-रे बलगम व खून की जा च के द्वारा दूर किया जाता है। इसके बाद स्पाइरोमेटरी एवं पीक फ्लो मीटर द्वारा जा च करके अस्थमा का निदान किया जाता है।

अस्थमा से संबंधित कुछ तथ्य


1. कई विश्व प्रसिद्ध नेता, अभिनेता एवं खिलाड़ी इस रोग से ग्रस्त होते हुए भी अपने जीवन में सफलता के चरम सोपान तक पहंुचे है।
2. अस्थमा शुरू होने की कोई निर्धारित उम्र नहीं है। बच्चों व किशोर अवस्था में ज्यादा होता है।
3. अस्थमा छूत की बीमारी नहीं है।
4. अस्थमा से पीडि़त कुछ वयस्कों (लगभग 25 प्रतिशत से कम) एवं बच्चों में से लगभग आधे बच्चे मध्य किशोर अवस्था तक नियमित इलाज लेने से अस्थमा से पूर्णतः छुटकारा पा जाते है या रोग काफी कम हो जाता है।
5. गर्भावस्था के साथ अस्थमा होने पर उचित एवं नियमित इलाज न लेने पर माता एवं शिशु के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ सकता है।
6. अस्थमा से पीडि़त व्यक्ति के खून के रिश्तेदारों को यह रोग होने की संभावना कुछ ज्यादा होती है।

अस्थमा पर नियंत्रण


हालांकि अस्थमा को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता है लेकिन निराश होने की आवश्यकता नहीं है। सावधानी एवंम् बचाव के उचित तरीकों के साथ नियमित एवं उचित इलाज से इस रोग के लक्षणों पर पूर्ण नियंतत्र किया जा सकता है एवं अब उपलब्ध आधुनिक इलाज से अस्थमा रोगी भी अन्य लोगों की तरह सामान्य एवं निर्बाध जीवन जी सकता है।
अस्थमा के उपचार के लक्ष्य
• लगभग लक्षण रहित दिनचर्या
• कष्ट रहित आरामदायक नींद।
• गंभीर दौरों के साथ अस्पताल मे भर्ती होने की जरूरत कम से कम या लगभग न पड़े।
• जीविकोपार्जन, अध्ययन, खेल, व्यायाम, मनोरंजन, दाम्पत्य जीवन एंव अन्य शारीरिक गतिविधियों में सामान्य जन की तरह पूर्ण भागीदारी।
• कम से कम कीमत की दवाइयों से विपरीत असर रहित उपचार।
• पूर्ण रोग मुक्ति के उपायों के लिए अनुसंधान

अस्थमा नियंत्रण के लिए आवश्यक है-


1. बीमारी का निदान व आंकलन:
लक्षणों के साथ
पीकफ्लोमीटर एवं स्पाईरोमीटर (पी.एफ.टी.) द्वारा श्वांस नलियों में सिकुड़न व सालब्यूटामोल इनहेलेशन से होने वाले सुधार (ब्रोंकोडाइलेटेशन टेस्ट) का आंकलन इलाज से पहले व इलाज के दौरान करना, इलाज के प्रभाव व रोग की बदलती हुई गंभीरता के आंकलन के लिए आवश्यक होता है। अच्छा हो अगर मरीज स्वयं संभंव हो तो घर पर पीकफ्लोमीटर से प्रतिदिन सुबह-शाम बदलती हुई पीकफ्लो रेट नाप कर स्वयं अपनी बीमारी की गंभीरता का आंकलन कर सकता है।
2. अस्थमा पैदा करने या बढाने वाले कारणों से बचाव के लिए वातावरण का नियंत्रण
3. औषधियां-
अ. श्वास नलियों को चैड़ा रखने के लिए (ब्रोंकोडाइलेटर ) - सालब्यूटामोल, लिवोसालब्यूटामोल, टरब्यूटालीन, सालमेट्रोल, फोरमेट्रोल, इप्राट्रोपियम ब्रोमाईड, टायोट्रोपीयम ब्रोमाईड, अमीनोफाईलीन, थियोफाईलीन, डोक्सिफा एवं एसिब्रोफाइलीन। ब. श्वसन नलियों में प्रतिक्रमण (इनफ्लेमेशन) पर नियंत्रण हेतु
एन्टीइन्फ्लेमेटरी दवाईयों-
र्कोटिकोस्टेरोइड, इन्हेलर से लेने वाले बेक्लोमिथाजोन, ब्यूडिसिनेमाईड, फ्ल्यूटिकाजोन, साईक्लोसोनाइड, मोमेन्टाजोन आदि एवं मुंह से लेने वाली (गोली या इंजेक्शन) प्रेडनिसोलोन, मिथाईल प्रेडनिसोलोन, डेफजाकोर्ट आदि।
स. इम्यूनोथिरेपी एवं डीसेन्सेटाईजेशन
द. अस्थमा शिक्षा -
अस्थमा पर नियंत्रण रखने के लिए चिकित्सकों एवं उनके सहयोगियों के साथ साथ अस्थमा रोगियों व उनके निकटतम रिश्तेदारों को निम्न पहलुओं पर अस्थमा शिक्षा आवश्यक है।
1. अस्थमा होने के कारण-कारक, लक्षण, निदान।
2. अस्थमा के इलाज में उपर्युक्त औषधिया व उनके फायदे व नुकसान व उनके लेने के उपकरणों का ज्ञान
3. अस्थमा से बचाव के उपाय।
4. चिकित्सक की सलाह से लम्बे समय के इलाज का कार्यक्रम तय करना व रोग के सम्बंधित संभावित बदलाव के लिए किये जाने वाले उपचार का ज्ञान
5. अस्थमा की गंभीरता का आंकलन व तुरंत किया जाने वाला उपचार।
6. चिकित्सक या चिकित्सालय में कब किन परिस्थितियों में परामर्श करना आदि।

दवा सेवन के उपकरण - इनहेलर्सं


सा स के द्वारा दवा अन्दर खींच कर सीधे फेफड़ों में पहुचाने को इनहेलेशन थेरेपी कहते हैं एवं इसमें काम मंे आने यंत्रों को इनहेलेर्स कहते हैं। सूंघ कर श्वांस के जरिए ली गई दवा की मात्रा मुंह से ली गई एवं इन्जेक्शन के द्वारा दिये गये इलाज की तुलना में अत्यधिक कम मात्रा में अधिकतम लाभकारी एवं तुरंत असरदार होती है। क्योंकि इस विधि से औषधि सीधे फेफड़ों में जाकर वांछित फायदा पह ुचाती है एवं शरीर के दूसरे अंगो पर इसका प्रभाव निम्नतर होने से इलाज के कुप्रभाव न के बराबर होते हैं।
सा स के द्वारा ली गई दवा मुख्यतया निम्न उपकरणों से दी जाती है।
1. ड्राई पाउडर इन्हेलर (डी.पी.आई.) - रोटाहेलर, डिस्कहेलर एवं मल्टीहेलर
2. स्प्रे इन्हेलर (मीटर्ड डोज इन्हेलर - एम.डी.आई) स्पेसर के साथ या इसके बिना
3. नेबूलाईज़र
तुरंत राहत (रिलिवर्स)
- ये दवाएं हवा के मार्ग को चैड़ा करके तुरन्त आराम पहुंचाती है। इनका असर अधिकतम 4-6 घंटों तक रहता है। जैसे सलब्युटामाॅल, लिवोसालब्यूआमोल, टरब्यूटालीन (नीले ढक्कन वाले एम. डी.आई. या रोटा कैप्सूल), इपराट्रोपियम ब्रोमाईड (हरा ढक्कन) इन्हेलर आदि।
रोकथाम चिकित्सा (प्रीवेन्टर्स)
- लम्बे समय तक लिया जाने वाला उपचार जिसमें अस्थमा का बेहतर नियंत्रण पाया जा सकता है एवं बार बार होने वाले अस्थमा के दौरों को कम किया जा सकता है, जैसे श्वास मार्ग की सूजन कम करने के लिए कोर्टिकोस्टिरोयड-बेक्लोमिथाजोन, ब्यूसिनामाईड, फ्लूटीकाजोन आदि (लाल या भूरे ढक्कन वाले) एवं श्वास मार्ग को चैड़ा रखने के लिए सालमेटरोल, फोरमेटरोल (नीले ढक्कन वाले) टाइट्रोपियम ब्रोमाईड (हरा ढक्कन)।

अस्थमा उपचार के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य


अस्थमा के उपचार में रोकथाम चिकित्सा का पर्याप्त प्रयोग किया जाना चाहिये ताकि तुरन्त राहत की दवाएं लेने की जरूरत ही न पड़े या कम से कम पड़े। इन्हेलर्स के द्वारा अस्थमा की दवा लेना सबसे असरदार तरीका है। गर्भावस्था और शिशुओं को स्तनपान कराने के दौरान इन्हेलर द्वारा दवा लेने में कोई खतरा नहीं है। इन्हेलर तेज नहीं होते व इनसे दुष्प्रभाव का खतरा भी लगभग नहीं के बराबर होता है। वृद्धावस्था, बच्चों एवं गंभीर अस्थमा रोगियों में एम.डी.आई के साथ स्पेसर लगाना लाभप्रद है। छोटे बच्चों एवं कभी कभी बुजुर्गाें में भी स्पेसर के साथ बेबी मास्क लगाना चाहिये।

अस्थमा के गंभीर होने के लक्षण


बार बार एवं ज्यादा तकलीफदेह घरघराहट के साथ श्वांस का फूलना, श्वांस फूलने ओर खांसी के कारण रात में बार बार नींद का खुलना, थोड़ी दूर चलने पर श्वास का फूलना, बार बार दवा लेने की जरूरत पड़ना, यदि बात करने में तकलीफ महसूस हो तो तुरन्त डाॅक्टर से सम्पर्क करें, समय की उपेक्षा ना करे। लापरवाही या अनदेखी खतरनाक हो सकती है।
अस्थमा का दौरा पड़ने पर याद रखें
♣ शांत रहें, घबरायें नहीं एवं हिम्मत रखे,
♣ जहा तक सम्भव हो धीरे धीरे और गहरी सांस लें,
♣ चिकित्सक द्वारा बताई गई दवाऐं लें (जैसे कि नीले ढक्कल वाला सालब्यूटामोल का इन्हेलर)
♣ यदि आपके डाक्टर ने कहा हो तो अपनी सांस की जा च पीकफ्लोमीटर से स्वयं करें।

सामान्य एवं स्वस्थ जीवन के सुझाव


• अस्थमा रोगी एवं उसके परिजन अस्थमा के बारे में पूर्ण ज्ञान रखें।
• अपना उपचार खुद ना करें, डाक्टरी सलाह लें।
• जिन कारणों से अस्थमा के दौरे की शुरूआत होती हो उससे बचें।
• बहुत ठण्डी/बर्फ युक्त पेय पदार्थों से व तेज मिर्च मसालों वाले भोजन से परहेज करें।
• रात में ब्रश-जीभी व गरारे सें मुंह व गला साफ करके सोएं,
• डाॅक्टर की सलाह से प्राणायाम एवं साधारण व्यायाम करें,
• ज्यादा पानी पीएं एवं रात को खाना हल्का व जल्दी खायें।
• दौरा ना होने एवं पूर्णतः लक्षण रहित होने पर भी डाॅक्टर द्वारा सुझायी गयी दवाएं बन्द ना करें एवं नियमित इलाज लें अन्यथा भविष्य में अस्थमा के दौरे बार बार एवं गंभीर होने की सम्भावना बढ जाती है।
• नियमित उपचार लेने से तीन महीने के अन्तराल से जांच के बाद दवाई की मात्रा कम एवं बाद में बन्द होने की संभावनाऐं बढ जाती है। चिकित्सक की राय से संभव हो तो पीकफ्लोमीटर का उपयोग कर स्वयं अस्थमा की गंभीरता का आंकलन कर सकते हैं।

घर में क्या करें या क्या न करें

• घर में फर्नीचर सेल्फ तथा ऐसी दूसरी कम उपयोगी चीजों की अत्यधिक भीड़ ना करें जिन पर धूल जम सकती है।
• तिलचट्टों व अन्य कीड़े-मकौड़ों से घ् ार को साफ रखें।
• कारपेट (गलीचा) साफ रखें अन्यथा इनके इस्तेमाल से बचें।
• झाड़ पौंछ के काम से दूर रहें। गीले कपड़े से साफ करें ताकि धूल ना उड़े सम्भव हो तो झाडू लगाने से पहले पानी छिड़कें अथवा वैक्यूम क्लीनर का उपयोग करें।
• पालतू जानवर को बहुत करीब ना आने दें।
• धूम्रपान ना करें व दूसरों द्वारा किये जाने वाले धूम्रपान के धुएं से भी बचें।
• बिस्तर को नियमित रूप से धोएं, झाड़ें व साफ-सुथरा रखें।
• तेज सुगन्ध, धूप बत्ती, रूम फ्रैशनर्स, खुशबूदार डिटरजेन्ट व खुशबूदार साबुनों के इस्तेमाल से बचें।
• अपने घर में हवा की आवा जाही की उचित व्यवस्था करें। घर में अन्दर या बाहर धूंआ, रेत, प्रदूषण आदि से पूर्ण बचाव सम्भव ना हो तो मूंह, नाक आदि को कपड़े से ढा क (ढाटा) लें।
विशेषकर घर की सफाई करते, वाहन चलाते या सवारी करते समय।
• खाना पकाते समय रसोई में छोंक व धुंए से बचने के लिए हवादार रसोई, चिमनी एवं एक्जोस्ट पंखे का इसतेमाल करें।

अस्थमा के इलाज में आने वाली समस्याऐं


1. आर्थिक अभाव
- आधे से जयादा रोगियों को लगभग जीवन भर नियमित या छोड़-छोड़ कर कभी ज्यादा या कभी कम खुराक में दवा की आवश्यकता पड़ती है। सामान्यतः अस्थमा रोगी को दवाओं का मासिक खर्चा लगभग 350 से 500 रू तक पड़ता है। सरकारी चिकित्सालयों में बी.पी.एल. कार्ड धारी अस्थमा रोगियों को मुफ्त दवा मिलने से गरीब रोगियों को काफी राहत है।
2. शिक्षा का अभाव
- कुछ इलाज करने वाले चिकित्सकों, उनके सहयोगियों एवं अधिकतर अस्थमा रोगियों एवं उनके रिश्तेदारें में अस्थमा शिक्षा का अभाव व इलाज के बारे में अज्ञानता, कुन्ठाएं एवं संशय
3. कार्य की अधिकता
- सरकारी चिकित्सालयों में अत्यधिक भीड़ एवं ज्ञान के अभाव में अस्थमा मरीजों पर पर्याप्त ध्यान एवं समय न लगाना
4. बढता प्रदूषण, बदलता रहन सहन।

समाधान के लिए सुझाव


1. सरकारी स्तर पर दवा कम्पनियां से बात करके व टैक्स कम करके दवाओं की लागत कम की जा सकती है।
2. सरकार, चिकित्सा संघों एवं अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं, अखबार, टेलीविजन, रेडियो एवं अन्य साधनों से प्रचार करके चिकित्सकों, अस्थमा रोगियों, उनके परिजनों एवं आम जन में अस्थमा शिक्षा का प्रचार प्रसार किया जा सकता है।
3. प्रदूषण को रोकने के पुख्ता प्रबन्ध
4. चिकित्सालयों में अस्थमा रोगियों एवं उनके परिजनों को शिक्षित करने के लिए ‘अस्थमा नर्स’/ ‘अस्थमा प्रशिक्षक’ का प्रावधान
5. स्कूलों में बच्चों व शिक्षकों को अस्थमा शिक्षा; ‘अस्थमा शिक्षक’
6. अंधता निवारण, कुष्ठ निवारण, टी.बी. निवारण आदि जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों की तर्ज पर अस्थमा निवारण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम का प्रावधान

डॉ. एम. साबिर