मानव श्वसन तंत्र की संरचना एवं कार्यप्रणाली




डॉक्टर मोहमद साबिर ,एम डी
FICN, FICP, FIACM, FGSI, FNCCPI, FICS
उपाध्यक्ष 2011-12 एवं सम्पादक पब्लिक फोरम
इंडियन चेस्ट सोसाइटी,
प्रोफ़ेसर एवं विभागयाध्यक्ष,औषध विभाग
एम् ए एम् सी, अग्रोहा, हिसार
सेवा निवृत प्रोफ्फेसर एवं विभागाध्यक्ष श्वसन सम्भाग
औषध विभाग, एस पी मेडिकल कॉलेज बीकानेर
डॉ शाहीन फारुक
स्नातकोत्तर छात्रा चक्षु विभाग
जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज
अलीग़ढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी , अलीग़ढ


‘तकनीकी शब्दावली का सरलीकरण करने का पूरा प्रयत्न किया गया है ताकि सामान्यजन को समझने में असुविधा न हो। फिर भी कुछ तकनीकी शब्द एवं प्रक्रियाओं की भाषा का सरलीकरण नहीं किया जा सका इस असुविधा के लिए हमें खेद हैं।’
                                                                                                                           संपादक




सभी प्राणियों की भांति मनुष्य के श्वसनतंत्र का मूल कार्य वातावरण से प्राणवायु (आॅक्सीजन) को ग्रहण करके मानव शरीर के विभिन्न अंगों की कोशिकाओं को भेजना एवं शारीरिक क्रियाओं के चलाने के लिए इन कोशिकाओं में सम्पन्न रसायनिक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप उत्पन्न कार्बन-डाई-आक्साइड व अन्य अशु़द्ध गैसों को रक्त से श्वसन क्रिया द्वारा बाहर निकालना है। श्वसन प्रक्रिया के दौरान वायुमण्डल से आक्सीजनयुक्त ताजा हवा को नाक, गले कण्ठनी व अन्य श्वांस नलियों (नैजल कैविटी, फेरिंग्स, लेरिंस, ट्रेकिया, ब्रोंकाई एवं ब्रोन्कियोलस) के जरिये श्वांस कोशिकाओं (एलवियोलाई) को पहुँचाया जाता है। श्वांस कोशिकाओं की दीवारों के सहारे सुक्ष्म रक्तवाहिनियों (केपीलेरीज) में मौजूद रक्त द्वारा ऑक्सीजन ग्रहण करके अषुद्ध रक्त द्वारा लाई गई कार्बनडाईआक्साइड को श्वांस कोशिकाओं में छोड़ दी जाती है जंहा से यह अषुद्ध वायु श्वांस निकालने की प्रक्रिया (एक्सपीरेशन) के जरिये फेफड़ों से बाहर वातावरण में छोड़ दी जाती है।

श्वसन संस्थान की संरचना

इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए मानव श्वसन तंत्र को तीन भागों में विभक्त किया जाता है।
1. नाक, मुंह, गला (नेजो फेरिंग्स)
2. श्वांस नली (ट्रेकिया, ब्रोन्काई, एवं ब्रोन्क्योल)
3. श्वसन ईकाई क्षेत्र (पलमोनरी रीजन)
नेजो फेरिग्स क्षेत्र
नाक मुंह गला (ध्वनी उत्पादक यंत्र लेरिंग्स सहित) वायुमण्डल से हवा लेकर श्वसन नलियों को पहुंचाते हैं।

नाक

बाहर से एक दिखने वाली नाक अन्दर से पतली हड्डी व झिल्ली निर्मित पर्दे (नेजल सेप्टम) द्वारा दो फनल की आकृति के दायें व बायें नाकगुहा में विभक्त रहती है। नाक के अन्दर मौजूद बालों, पतली झिल्ली में रक्त प्रवाह व इसकी सतह पर स्थित झाडूनुमा सिलिया, म्यूकस पैदा करने वाली ग्रन्थियों आदि आपसी सहयोग से श्वांस वायु का शुद्धिकरण करके तापमान व आद्रता को मानव फेफड़ों के अनूकूल नियंन्त्रित करते हैं। नाक में इस प्रकार हटाई गई अशुद्धिया छींक द्वारा नाक साफ करते वक्त बाहर फेंक दी जाती है नाक के बाहरी हिस्से में मौजूद दोनों तरफ नथुने (नोजरिल्स) सास प्रक्रिया में कठिनाई आने पर फूलने व सिकुड़ने (नाक का फड़फड़ाना) लग जाते हैं।


चित्र संख्या 1.

गला (फैरिग्स)

• फैरिंग्स के उपर का हिस्सा नाक के पिछले भाग से जुड़ा होता है जो दो नलियों (यूस्टेचीयन) के जरिये दोनों कानों से जुड़ा रहता है जो गले व कान में हवा के दबाव को सन्तुलित करता है। जुकाम या गले के कुछ रोगों में इस नली में रूकावट आजाने से कान व सर के पिछले हिस्से में भारीपन, चक्कर व चलने, सुनने व संतुलन कायम रखने में परेषानी का अनुभव होता है।
• फैरिंग्स का मुह वाला हिस्सा मुख्य तौर पर भोजन को खाने की नली की ओर ले जाता है।
• फैरिंग्स के पिछले हिस्से को लैरिंगों-फैरिंग्स कहते है जो भोजन नली एवं लैरिंग्स के जरिये श्वासनली से जुड़ा रहता है।
कंठनली या हलक (लैरिंग्स) भोजन एवं हवा के प्रवाह को नियंन्त्रित करने के साथ साथ ध्वनि उत्पन्न करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य गले के इस अंग द्वारा किये जाते हैं गले का यह महत्वपूर्ण अंग अलग-अलग आकार की नौ कार्टिलेज (हड्डी व झिल्ली के बीच का कड़ा परन्तु लचीला टिशु), झिल्लियों एवं लिगामेंट व अन्य तन्तुओं के समूह द्वारा निर्मित होता है। नौं में से एक कार्टिलेज ऐपीग्लाटिस भोजन निगलने के दौरान उसे सांस नली में जाने से रोकती है।

वोकलकोड (ध्वनि उत्पादक यंत्र) विशेष लचीले लिगामेंटों एवं मांसपेशियों के कम्पन से ध्वनि उत्पादन करता है। ध्वनि की यह तरंगें गले व मुंह के सभी अंगों जैसे जीभ, गाल, तालू, हौंठ व दांतों के सामुहिक प्रयास से मुंह से निकलने वाले शब्दों, वाक्यों व अन्य आवाजों में परिवर्तित कर देते हैं।

श्वास नली (ट्रेकियो-ब्रोकियल ट्री) मुंह ओर नाक द्वारा ग्रहण की गई वायु को फेफड़ों में अन्तिम छोर तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य श्वांसनली करती है। इसके विभिन्न हिस्से निम्न प्रकार है।
• ट्रेकिया जिसे हम गर्दन के नीचे हंसली की हड्डी के उपर से छाती में प्रवेश करते हुए कड़े पाइप के रूप में महसूस कर सकते हैं। लगभग 4 ईंच लंबी एवं 1 ईंच व्यास की यह नली लचीले परन्तु कड़े कार्टिलेज के छल्लों एंव मजबूत तन्तुओं के द्वारा बनी होती है। इस मजबूत संरचना के कारण ही इसे पूर्णतया अवरूद्ध करने के लिए काफी दबाव लगाना पड़ता है।
• टेंटूआ दबने, फांसी लगने जैसी परिस्थितियों में मृत्यु का कारण श्वास नली के गर्दन में स्थित इन हिस्सों का अवरूद्ध होना होता है।
• ब्रोन्क्रियल ट्री किसी घने पेड़ को उल्टा करके कल्पना करें तो कण्ठनली व ट्रेकिया उसके तने के समान है व ट्रेकिया की निरन्तर विभाजित होती शाखाऐं ब्रोन्कियल ट्री के रूप में सांस द्वारा ग्रहण की गई वायु को फेफड़ों के अन्तिम छोर तक पहचाती है। एक ईच व्यास का ट्रेकिया दाएं बाएं दो मूल ब्रोन्काई (प्राईमरी ब्रोन्काई) में विभाजित होकर फेंफड़ों के विभिन्न हिस्सों (लोब्स व सेगमैंट्स) में सैकेन्ड्री ब्रोन्काई, र्टसरी ब्रोन्काई, प्राईमरी ब्रोन्कियोंल, अन्तिम (टर्मिनल) ब्रोन्क्योल (आधा मिलिमीटर व्यास), रेस्पीरेट्री ब्रोन्क्योल तक विभाजित होकर श्वसन ईकाई तक पहुचते हैं।

चित्र संख्या 2.


पल्मोनरी क्षेत्र

ब्रोंकियल ट्री के अन्तिम छोर पर श्वास कोशिकाएं (एलवियोलाई) स्थित रहतीं हैं, जिन्हें हम श्वसन प्रक्रिया की इकाई भी कह सकते हैं। सामान्यतया मनुष्य के शरीर में 3000 लाख ऐलवियोलाई होते हैं जिनमें से आधे से थोड़े से ज्यादा सामान्य परिस्थितियों में कार्यरत रहते हैं बाकी के अत्यधिक शारीरिक श्रम जैसे आपात स्थितियों के लिए आरक्षित रहते हैं। शरीर के लगभग सभी महत्वपूर्ण अंगों में आपात स्थिति के लिए इस तरह की आरक्षित (रिजर्व) व्यवस्था होती है। नियंमित व्यायाम इन महत्वपूर्ण आरक्षित व्यवस्थाओं को जाच करके पुख्ता व गतिशील रखना है।
फेफड़े (लंग्स)

फेफड़े मानव शरीर के महत्वपूर्ण अंग हैं। श्वसन प्रक्रिया का अन्तिम चरण यानी शुद्ध/अषुद्ध गैसों (मुख्यता आक्सीजन एवं कार्बन डाईआक्साईड) का आदान प्रदान यहीं होता है। मजबूत छाती में सुरक्षित फेफड़े हद्य, मुख्य रक्तवाहिनियों, श्वास नलियों एवं मध्य छाती के अन्य अंगांे (लिम्फ ग्रन्थियां एवं वाहिनियां, थाईमस ग्रन्थि आदि) को न सिर्फ सुरक्षा परन्तु स्थिर रखने में भी सहायक होते हैं। नये पुराने रोगों जैसे टी.बी., सी.ओ.पी.डी., कैंसर, निमोनियां व अन्य सन्क्रमण आदि अनेकों अनेक रोगों में फेफड़ों की संरचना बिगड़ने एवं कार्यप्रणाली प्रभावित होने से खासी, सास फूलना, शरीर का नीला पड़ना (साईनोलिस) बलगम आना, खून आना आदि अनेक कष्टदायक एवं जान लेवा परिस्थितियां उतपन्न हो सकती है।
फेफड़ों की संरचना असंख्य श्वासनलियों, एलवियोलाई, रक्त वाहिनियों, लिम्फ वाहिनियों, लचीले तन्तुओं, मजबूत फाईबरस, झिल्लिया एवं आंतरिक सुरक्षा की कोशिकाओं से निर्मित हैं। दोनों फेफड़ों की सतह चिकनी एवं चमकीली होती है फेफड़े बड़े हल्के स्पंजी एवं इलास्टिक होते हैं जो वायु की उपस्थिति के कारण पानी में तैरते हैं।
       जन्म के समय फेफड़ों का रंग हल्का गुलाबी होता है जो आयु के साथ साथ प्रदूषित वायु में उपस्थित कार्बन के जमने से काला पड़ जाता है। व्यस्क पुरूषों के फेफड़े (625 ग्राम) व्यस्क महिलाओं के फेफड़ों (567 ग्राम) की तुलना में थोड़े भारी होते हैं। सीधे हाथ के फेफड़ों में तीन खण्ड (लोब) होते हैं। उल्टे हाथ का फेफड़ां दो खण्डों में विभक्त रहता है। प्रत्येक खण्ड में कई उपखण्ड होते हैं जो कई सैगमैंट्स में विभाजित रहते हैं और इसी क्रम में श्वाॅस नली की शाखाएं, धमनियों एवं शिराओं की शाखाएं विभाजित होते हुए लगभग प्रत्येक सैगमैंट को स्वतंत्र रूप से वायु एवं रक्त मुह ̧या कराके, शुद्धिकरण के पश्चात वापिस इकट्ठा करके श्वास क्रिया व रक्त प्रवाह का कार्य सम्पन्न करने में सहायक होते हैं। एक सैगमैंट या खण्ड का रोग जल्दी से दूसरे सैंगमैंट या खण्ड में नहीं फैलता जब तक कि बीमारी भयंकर न हो।


चित्र संख्या 3.

श्वास प्रक्रिया का संपादन- श्वसन संस्थान का मूल कार्य वायुमण्डल से आॅक्सीजन ग्रहण करना एवं शरीर की कोशिकाओं की क्रियाओं द्वारा उत्पन्न कार्बनडाई आॅक्साइड को फेफड़ों के द्वारा शरीर से बाहर निकालना है। श्वांस प्रक्रिया में छाती के चारों ओर जड़ी मांसपेशिया एवं पसलिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। श्वास अन्दर लेने की प्रक्रिया को इन्सपीरेशन कहते हैं और बाहर निकालने की क्रिया को एक्सपीरेशन कहते हैं। सांस लेने व निकालने की प्रक्रिया जन्म से लेकर मृत्यु तक निरंतर चलने वाली स्वचालित प्रक्रिया है जो मस्तिष्क में स्थित श्वॅसन केन्द्र, खून, वातावरण एवं फेफड़ों में कार्बनडाई आॅक्साइड व आॅक्सीजन की मात्रा द्वारा नियंत्रित होती है। सामान्यतया कोई भी मनुष्य लंबे समय तक सांस प्रक्रिया को रोक नहीं सकता ।
         विशेष परिस्थितियों जैसे खाना खाते वक्त, बोलते वक्त या कुछ हठ योगी कुछ मिनट तक ऐसा कर सकते हैं। सांस अन्दर लेने की प्रक्रिया में पसलियों के बीच स्थित मांसपेशियों (एक्सटरनल इंटरकोस्टल मसल्स) एवं डायफ्राम (पेट व फेफड़ों के बीच मोटी मजबूत मांसपेशियों की झिल्ली) के क्रियाशील होने से बाल्टी के हैंडल की तरह पसलियां उपर उठ जाती है छाती फूल जाती हैं इससे वायुमण्डल की हवा फेफड़ों में आ जाती है। एक्सपीरेशन की क्रिया के दौरान उपरोक्त मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं जिससे छाती वापिस पिचक जाती है और फेफड़ो के गुब्बारे की तरह पिचकने से हवा बाहर निकल जाती है। इस प्रक्रिया में फेफड़ों का लचीलापन एवं उसकी गुब्बारे की तरह सिकुडने की क्षमता (इलास्टिक रिकोईल) काफी सहायक होते हैं।
          श्वास प्रक्रिया द्वारा फेफड़ों में ग्रहण की गई वायु अन्तोगत्वा श्वास कोशिकाओं में पहुंती है जंहा पर हृद्य से लाया गया अशुद्ध रक्त वायु के संपर्क में आता है। श्वांस कोशिकाओं (एलवियोलाई) एवं उनमें चारों ओर स्थित सूक्ष्म रक्त वाहिनियों (केपेलेरीज) की दीवारों में अति सूक्ष्म छिद्र होते हैं, उनमे से केवल गैस के कण ही इधर उधर जा सकते हैं, रक्त कोशिकाए ं उनमें से नहीं गुजर सकती। इन्हीं छिद्रों से ऑक्सीजन के कण सूक्ष्म केपेलरीज में पहुच जाते है और हृद्य द्वारा लाए गए अशुद्ध रक्त मंे उपस्थिति (मुख्यतः) हिमोग्लोबिन द्वारा ग्रहित करली जाती है। मुख्यतः रक्त में मौजूद लाल कोषिकाऐं (आर.बी.सी.) इस प्रक्रिया में सक्रिय रहती हैं। अशुद्ध ब्लड से कार्बनडाईआक्साइड निकल कर छिद्रों द्वारा सांस कोशिकाओं (एलवियोलाई) में आ जाती है इस प्रकार शुद्ध किया हुआ रक्त रक्तवाहिनियां द्वारा वापिस हृद्य को पहुचा दिया जाता है जंहा से पूरे शरीर को धमनियों के रास्ते पम्प कर दिया जाता है।
          रक्त शरीर के विभिन्न अंगांे की कोशिकाओं द्वारा रासायनिक प्रक्रिया से उत्पन्न अशुद्धियों को शिराओं के जरिये हृद्य के बायें हिस्से में लाता है वहा से वो फेफड़ों की सूक्ष्म रक्त वाहिनियाे (केपिलेरीज) में शुद्ध होने के लिए पम्प कर दिया जाता है।
          इस प्रकार सामान्यतया एक स्वस्थ व्यस्क में प्रतिदिन लगभग 1000 लीटर खून का फेफड़ों में शुद्धिकरण होता है यह प्रक्रिया जीवन प्रयन्त निरंतर चलती रहती है। सामान्यतः एक स्वस्थ व्यक्ति एक मिनट में 10 से 20 बार सांस अन्दर लेकर बाहर निकालता है और हर सांस में तकरीबन 250 से 450 मि.ली. वायु का आदान प्रदान होता है।
          छोटे बच्चों में बड़ों के मुकाबले श्वास गति तेज होती है। सामान्यता नवजात शिशुओं (30 से 40 प्रति मिनट) और व्यस्कों में व्यायाम भावनाओं के उतार चढाव एवं गर्भावस्था के दौरान श्वांस की गति तेज हो जाती है। दर्द व तकलीफ पैदा करने वाली परिस्थितियों में भी सांस की गति तीव्र हो जाती है। प्रतिदिन लगभग 8 से 9 हजार लीटर वायु सामान्य परिस्थितियों में एक व्यस्क अन्दर लेकर बाहर निकालता है।
          अन्दर जाने वाली वायु में नाईट्रोजन 78 प्रतिशत, आक्सीजन 21 प्रतिशत के अलावा आरगेनोन, हिलियम गैसे एवं भाप आदि मौजूद रहते है। सांस बाहर निकालने की प्रक्रिया में बाहर निकाली गई वायु में कार्बनडाई आक्साइड 4 से 5 प्रतिशत बढ जाती है व आक्सीजन 4 से 5 प्रतिशत कम हो जाती है। श्वांस प्रक्रिया द्वारा बाहर निकाली गई वायु में निम्न मात्रा में शरीर की रासायनिक क्रियाओं से उत्पन्न कुछ गैसें जैसे हाइड्रोजन, कार्बन मोनो आक्साइड, अमोनिया, ऐसीटोन, मिथेनोल एवं इथेनाल अलकोहन आदि भी पाये जाते हैं। शराब के सेवन के बाद सांस से निकली वायु में इथेनोल अलकोहल की मात्रा ज्यादा बढ जाती है।

प्ल्यूरा एवं प्ल्यूरल केविटी – फेफड़े व छाती के अन्दर का भाग एक पतली झिल्ली से ढका रहता है जिसे प्ल्यूरल कहते हैं। फेफड़ों को ढकने वाली झिल्ली को विसरल पल्यूरा कहते हैं, और छाती के अन्दर की झिल्ली को पेराईटल पिल्यूरा कहते हैं। इन दोनों के बीच के स्थान को पल्यूरल केविटी कहते हैं। इसके खाली स्थान (पल्यूरल स्पेस) में सूक्ष्म मात्रा में चिकना तरल पदार्थ होता है जो लगातार बनता रहता हैं और लिम्फैटिक तंत्र के द्वारा सोखकर रक्त में मिला दिया जाता है। कई बीमारियों में जैसे संक्रमण, हृद्य व गुर्दे के रोग खून की कमी आदि रोगों में इस तरल पदार्थ की मात्रा बढ जाती है (पल्यूरल ईफ्यूजन), जिसे निकालना पड़ता है।
          इस प्रकार हमारा श्वसन तंत्र निरंतर प्राणवायु ऑक्सीजन हमारे शरीर की एक एक कोशिका को उपलब्ध कराकर जीवन प्रदान करता है। इसको सामान्य चलने के लिए न सिर्फ फेफड़ों का स्वास्थ्य आवश्यक है परन्तु वरन् मज़बूत मासपेशियों एवं हड्डियों के साथ साथ कार्यशील जोड़ों का होना भी अतिआवश्यक है। नियमित व्यायाम न सिर्फ फेफड़ों के आरक्षित क्षमता को बढाता है वरन् उसकी सामान्य कार्यप्रणाली में अतिसहायक है।

डॉक्टर मोहमद साबिर